‘घूसखोर पंडित’ फिल्मी टाइटल नहीं, यह सामाजिक ज़हर है

महराजगंज

जन प्रहरी न्यूज़
घूसखोर पंडित” कोई मासूम फ़िल्मी टाइटल नहीं है, बल्कि एक ऐसी गलत और खतरनाक परंपरा की शुरुआत है, जो अगर आज नहीं रोकी गई तो कल समाज को सीधे टकराव की ओर ले जाएगी। जातीय पहचान को अपमानजनक विशेषण के साथ जोड़ना न कला है, न साहस—यह सीधी-सीधी सामाजिक उकसावेबाज़ी है।
आज ‘पंडित’ शब्द के साथ ऐसा प्रयोग हुआ है, कल किसी और जातीय टाइटल के साथ होगा। फिर कोई यह कहने की स्थिति में नहीं रहेगा कि “हमारे साथ अन्याय हुआ”, क्योंकि परंपरा तब तक स्थापित हो चुकी होगी।
खबरें यह भी हैं कि विवाद सिर्फ़ टाइटल तक सीमित नहीं है, बल्कि फ़िल्म के डायलॉग भी आपत्तिजनक हैं। यानी चोट जानबूझकर की गई है—संयोग नहीं है यह। ऐसे में भावनाएं आहत होंगी ही, और जब भावनाएं आहत होती हैं तो समाज में शांति नहीं, संघर्ष पैदा होता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि फ़िल्म के निर्माता, निर्देशक और कलाकार सभी उसी समाज से आते हैं, जिसके नाम को अपमानजनक तरीके से इस्तेमाल किया गया है। केस भी उन्हीं के खिलाफ दर्ज है, विरोध भी उन्हीं के भीतर से उठ रहा है। यानी गलत शुरुआत भी उन्होंने की और नुकसान भी उन्हें ही झेलना पड़ रहा है।
अब आते हैं असली मुद्दे पर।
जब बहनजी ने इस फ़िल्म के विरोध को देखते हुए बैन की मांग कर दी, तो कुछ तथाकथित दलित बुद्धिजीवी ऐसे बिदक गए मानो उनके अस्तित्व पर हमला हो गया हो। तंज, व्यंग्य, कटाक्ष—सब कुछ बहनजी के खिलाफ़ उड़ेल दिया गया। सवाल है, क्यों?
क्या फ़िल्म बैन होने से उनकी जेब कट गई?
क्या उनकी आमदनी घट गई?
क्या उनके रोजगार पर ताला लग गया?
या फिर उनके मुनाफ़े में सेंध लग गई?
इन सबका जवाब है—नहीं।
तो फिर दिक्कत क्या है?
दिक्कत फ़िल्म से नहीं है।
दिक्कत विरोध से नहीं है।
दिक्कत बहनजी से है।
अगर इनको सच में फ़िल्म के विरोध से समस्या होती, तो विरोध करने वालों पर सवाल उठाते। लेकिन इन्होंने ऐसा नहीं किया। इन्होंने सीधा बहनजी को निशाना बनाया। इसका मतलब साफ़ है—ये लोग बहनजी के विरोधी हैं, और विरोध के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
इसी मानसिकता के कारण देश में दलित नेतृत्व को बार-बार कमजोर किया गया। जिस एक राज्य में सत्ता मिली, वहां भी पार्टी को कमजोर करने में ऐसे ही “अति-बुद्धिजीवियों” का बड़ा योगदान रहा।
आज सवाल फ़िल्म का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या जातीय अपमान को अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर जायज़ ठहराया जाएगा?
और क्या बहनजी के हर फैसले का विरोध करना ही कुछ लोगों की स्थायी राजनीति बन चुका है?
अगर समाज को टकराव से बचाना है, तो ऐसी परंपराओं को यहीं, अभी और साफ़ शब्दों में खारिज करना होगा।

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