जन प्रहरी न्यूज़
बहनजी के ट्वीट के बाद अखिलेश यादव का विवादित फिल्म “घूसखोर पंडित” के खिलाफ सामने आना राजनीतिक रूप से चौंकाने वाला नहीं है। उन्होंने इसे अत्यंत आपत्तिजनक बताते हुए यहां तक कहा कि फिल्म का नाम तक लिखा नहीं जा सकता और ऐसी फिल्मों पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए। यह बयान सिद्धांत से अधिक रणनीति का हिस्सा लगता है।
विडंबना यह है कि जब यादव समाज को लेकर गंगाजल जैसी फिल्मों में खुलेआम नकारात्मक और आपत्तिजनक चित्रण किया गया, तब न अखिलेश यादव बोले और न ही किसी बड़े यादव नेता या संगठन ने आपत्ति जताई। उस समय जातीय अपमान कोई मुद्दा नहीं था, लेकिन आज अचानक संवेदनशीलता जाग गई है।
यादव समाज इसे समझता है। इसलिए अखिलेश यादव के ट्वीट से उन्हें न कोई शिकायत है, न नाराज़गी। राजनीति सत्ता के लिए की जाती है, समाज सेवा के लिए नहीं—यह बात सब जानते हैं। अखिलेश यादव भी सत्ता की लड़ाई लड़ रहे हैं और उसी के अनुरूप बयान दे रहे हैं।
दिलचस्प यह है कि जिन लोगों ने यादव समाज के अपमान पर कभी आवाज़ नहीं उठाई, वही लोग आज मायावती के फिल्म विरोध से बौखलाए हुए हैं। बहनजी के ट्वीट को लेकर न सिर्फ राजनीतिक असहमति जताई जा रही है, बल्कि उनके समर्थकों को भी गालियां दी जा रही हैं—‘अंधभक्त’, ‘मायाभक्त’ जैसे शब्दों से नवाज़ा जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर अखिलेश यादव के फिल्म विरोध को जायज़ माना जा सकता है, तो मायावती के उसी विरोध पर आपत्ति क्यों? क्या जातीय अपमान के खिलाफ आवाज़ उठाने का अधिकार कुछ नेताओं के लिए सुरक्षित है और कुछ के लिए अपराध?
हकीकत यह है कि बहनजी ने फिल्म का विरोध कर किसी से कुछ छीना नहीं है। न किसी का अधिकार गया है, न किसी का वर्चस्व। लेकिन असहजता साफ बताती है कि समस्या फिल्म नहीं, बल्कि वह नेता है जो दलित राजनीति का प्रतीक है।
यही चयनात्मक आक्रोश भारतीय राजनीति की असली तस्वीर है।
