वादा भूल गए जनप्रतिनिधि, मिटती जा रही घुघली चीनी मिल की विरासत!

*सांसद से मुख्यमंत्री बने, लेकिन घुघली शुगर मिल आज भी बंद; अस्तित्व बचाने की गुहार अनसुनी”*

महराजगंज

महराजगंज। जन प्रहरी न्यूज़ कभी पूर्वांचल की औद्योगिक पहचान और किसानों की आर्थिक रीढ़ मानी जाने वाली घुघली चीनी मिल आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। एक समय उत्तर प्रदेश की प्रमुख चीनी मिलों में शुमार रही यह ऐतिहासिक मिल अब उपेक्षा, लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बनती जा रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्ष 1992 के चुनाव के दौरान घुघली में आयोजित एक जनसभा में तत्कालीन सांसद रहे योगी आदित्यनाथ ने मंच से घोषणा की थी कि यदि वह घुघली चीनी मिल को चालू नहीं करा पाए तो अपने संसदीय पद से इस्तीफा दे देंगे। समय बीतता गया, सांसद से मुख्यमंत्री तक का सफर तय हो गया, लेकिन घुघली चीनी मिल की चिमनियों से धुआं फिर कभी नहीं उठा।
क्षेत्रीय नागरिकों और पूर्व कर्मचारियों का आरोप है कि यदि प्रदेश सरकार गंभीरता से पहल करे तो इस ऐतिहासिक मिल को पुनर्जीवित करने में अधिक समय नहीं लगेगा। लेकिन वर्षों से सिर्फ आश्वासन और चर्चाएं होती रहीं, जबकि धरातल पर कोई ठोस कदम दिखाई नहीं दिया।
वहीं, स्थानीय लोगों का यह भी आरोप है कि वर्तमान में मिल परिसर की देखरेख कर रहे बृजेश चौधरी द्वारा मिल की ऐतिहासिक धरोहर और पहचान को धीरे-धीरे समाप्त किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि जिस विरासत को संरक्षित किया जाना चाहिए था, वह आज उपेक्षा का शिकार बनती जा रही है।
*कभी किसानों की उम्मीद थी घुघली चीनी मिल, आज खंडहर बनकर पूछ रही हैँ मेरा कसूर क्या है?*
घुघली के अस्तित्व और चीनी मिल के पुनर्जीवन को लेकर मीडिया टीम ने जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, सदर विधायक जय मंगल कनौजिया तथा पनियरा विधायक ज्ञानेंद्र सिंह से भी बातचीत कर इस गंभीर मुद्दे को उठाया। जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष घुघली की पहचान बचाने की मांग रखी गई, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है।
क्षेत्रवासियों का कहना है कि यह केवल एक बंद चीनी मिल का मामला नहीं है, बल्कि हजारों किसानों, मजदूरों और घुघली की ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा विषय है। यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों और किस्सों में ही घुघली चीनी मिल का नाम सुनेंगी।
अब सवाल यह है कि आखिर घुघली चीनी मिल को बचाने की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? क्या जनप्रतिनिधि और प्रशासन इस ऐतिहासिक धरोहर को पुनर्जीवित करने के लिए आगे आएंगे, या फिर यह विरासत हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी?

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